श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  13.122.4-5 
भीष्म उवाच
समृद्धौ वासमृद्धौ वा शुभे वा यदि वाशुभे।
संसारेऽस्मिन् समायाता: प्राणिन: पृथिवीपते॥ ४॥
निरता येन भावेन तत्र मे शृणु कारणम्।
सम्यक् चायमनुप्रश्नस्त्वयोक्तस्तु युधिष्ठिर॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले- हे पृथ्वीपति! इस संसार में आए हुए प्राणी उन्नति या अवनति तथा अच्छी या बुरी अवस्था में सुख पाते हैं। वे मरना नहीं चाहते। इसका क्या कारण है, वह मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो। युधिष्ठिर! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है।॥4-5॥
 
Bhishmaji said-Lord of the Earth! The creatures who have come to this world find happiness in progress or decline and in good or bad conditions. They do not want to die. What is the reason for this, I will tell you, listen. Yudhishthir! You have raised a very good question. ॥ 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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