श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  13.122.29 
कर्मणा पुनरेवाहं सुखमागामि लक्षये।
तच्छ्रोतुमहमिच्छामि त्वत्त: श्रेयस्तपोधन॥ २९॥
 
 
अनुवाद
तपदान! अब मैं भविष्य में कोई पुण्य कर्म करके सुख प्राप्त करने की आशा करता हूँ। मैं आपसे सुनना चाहता हूँ कि वह पुण्य कर्म क्या है।
 
Tapadhan! Now I hope to attain happiness in the future by doing some good deed. I want to hear from you what that good deed is.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कीटोपाख्याने सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीटका उपाख्यान विषयक एकसौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११७॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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