श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  13.122.27-28 
शुभानां नाभिजानामि कृतानां कर्मणां फलम्।
माता च पूजिता वृद्धा ब्राह्मणश्चार्चितो मया॥ २७॥
सकृज्जातिगुणोपेत: संगत्या गृहमागत:।
अतिथि: पूजितो ब्रह्मंस्तेन मां नाजहात् स्मृति:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
मैंने अभी तक अपने पूर्वजन्म के पुण्यों का फल नहीं भोगा है। पूर्वजन्म में मैंने केवल अपनी वृद्धा माता की सेवा की थी और एक दिन संयोगवश मैंने अपने घर आए हुए एक ब्राह्मण अतिथि का सत्कार किया, जो अपनी जाति के गुणों से युक्त था। हे ब्रह्मन्! उस पुण्य के प्रभाव से मुझे आज तक पूर्वजन्म की स्मृति नहीं रही।॥ 27-28॥
 
I have not yet experienced the fruits of my past good deeds. In my previous life I only served my old mother and one day, by chance I welcomed a Brahmin guest who had come to my house and was endowed with the qualities of his caste. O Brahman! Due to the effect of that good deed, the memory of my previous life has not left me till date.॥ 27-28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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