श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  13.122.24 
धनं धान्यं प्रियान् दारान् यानं वासस्तथाद्भुतम्।
श्रियं दृष्ट्वा मनुष्याणामसूयामि निरर्थकम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
दूसरे मनुष्यों को धन, धान्य, सुन्दर पत्नियाँ, उत्तम वाहन, सुन्दर वस्त्र और उत्तम सम्पत्ति से युक्त देखकर मैं उनसे अकारण ही ईर्ष्या करता था॥ 24॥
 
Seeing other men having wealth, grains, beautiful wives, fine vehicles, wonderful clothes and excellent wealth, I used to be jealous of them without any reason.॥ 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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