श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  13.122.23 
गुप्तं शरणमाश्रित्य भयेषु शरणागता:।
अकस्मात् ते मया त्यक्ता न त्राता अभयैषिण:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
भय के समय बहुत से शरणार्थी मेरे पास शरण लेने आते थे, परन्तु मैं उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाकर भी अचानक वहाँ से भगा देता था। मैं उनकी रक्षा नहीं करता था॥ 23॥
 
In times of fear, many refugees would come to me seeking protection, but even after taking them to a safe place to take shelter, I would suddenly drive them out from there. I did not protect them.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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