श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  13.122.22 
देवार्थं पितृयज्ञार्थमन्नं श्रद्धाऽऽहृतं मया।
न दत्तमर्थकामेन देयमन्नं पुरा किल॥ २२॥
 
 
अनुवाद
पूर्वजन्म में मैं देवताओं और पितरों को तर्पण करने के लिए भक्तिपूर्वक अन्न संग्रह करता था; परंतु धन संचय की इच्छा से मैं उस अन्न को भी दान नहीं करता था जो देने योग्य था ॥22॥
 
In my previous life I used to collect food grains with devotion for offerings to gods and forefathers; but due to the desire to accumulate wealth I did not donate even that food which was worth giving. ॥22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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