श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  13.122.21 
भृत्यातिथिजनश्चापि गृहे पर्यशितो मया।
मात्सर्यात् स्वादुकामेन नृशंसेन बुभुक्षता॥ २१॥
 
 
अनुवाद
मैं इतना निर्दयी था कि केवल स्वाद के लिए ही भोजन की इच्छा करता था और ईर्ष्या के कारण अपने घर आए अतिथियों और आश्रितों को खिलाए बिना ही खा लेता था ॥ 21॥
 
I was so cruel that I would desire food only for the sake of its taste and, out of jealousy, I would eat without feeding the guests and dependents who came to my house. ॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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