श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  13.122.20 
वाक्तीक्ष्णो निकृतिप्रज्ञो द्वेष्टा विश्वस्य सर्वश:।
मिथ्याकृतोऽपि विधिना परस्वहरणे रत:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
कठोर वचन बोलना, बुद्धि से लोगों को ठगना और संसार में सबके प्रति द्वेष रखना मेरा स्वभाव बन गया था। झूठ बोलकर लोगों को ठगना और दूसरों की संपत्ति हड़पने में लगे रहना - यही मेरा कर्म था।
 
Speaking the harshest words, cheating people with intelligence and being hostile towards everyone in the world had become my nature. Cheating people by telling lies and being engaged in usurping the property of others – this was my work.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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