श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  13.122.18 
इहापि विषय: सर्वो यथादेहं प्रवर्तित:।
मानुषा: स्थैर्यजाश्चैव पृथग्भोगा विशेषत:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
यहाँ भी सभी वस्तुएँ इस शरीर के अनुसार उपलब्ध हैं। मनुष्य और स्थावर प्राणियों के भोग भिन्न-भिन्न हैं ॥18॥
 
Here also all the objects are available according to this body. The enjoyments of humans and immobile creatures are different. ॥18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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