श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.122.17 
कीट उवाच
सर्वत्र निरतो जीव इतश्चापि सुखं मम।
चिन्तयामि महाप्राज्ञ तस्मादिच्छामि जीवितुम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
कीड़े ने कहा, "हे महर्षि! सभी योनियों में प्राणी सुख का अनुभव करते हैं। मैं भी इस योनि में सुख पाता हूँ और यही सोचकर मैं भी जीना चाहता हूँ।"
 
The worm said, "O great sage! Living beings experience happiness in all species. I too find happiness in this species and thinking this, I wish to continue living."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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