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श्लोक 13.122.16  |
शब्दं स्पर्शं रसं गन्धं भोगांश्चोच्चावचान् बहून्।
नाभिजानासि कीट त्वं श्रेयो मरणमेव ते॥ १६॥ |
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| अनुवाद |
| हे कीट! तू शब्द, स्पर्श, रस, गंध तथा अनेक छोटे-बड़े सुखों का अनुभव नहीं करता। अतः तेरे लिए मर जाना ही अच्छा है।॥16॥ |
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| ‘Insect! You do not experience sound, touch, taste, smell and many small and big pleasures. Therefore it is better for you to die.'॥ 16॥ |
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