पठेद् वा य इदं राजन् शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णश:।
अमांसभक्षणविधिं पवित्रमृषिपूजितम्॥ ७२॥
विमुक्त: सर्वपापेभ्य: सर्वकामैर्महीयते।
विशिष्टतां ज्ञातिषु च लभते नात्र संशय:॥ ७३॥
अनुवाद
हे राजन! इसमें कोई संदेह नहीं कि जो मनुष्य ऋषियों द्वारा पवित्र एवं आदरणीय इस मांसाहार-विरति प्रसंग को बार-बार पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है, समस्त इच्छित भोगों से सम्मानित होता है और अपने बन्धु-बान्धवों में विशेष स्थान प्राप्त करता है ॥ 72-73॥
O King! There is no doubt that one who repeatedly reads or listens to this episode of abstinence from meat-eating, which is sanctified and respected by the sages, becomes free from all sins, is honoured with all desired pleasures and attains a special place among his fellow-caste friends. ॥ 72-73॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥