श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन  »  श्लोक 58-61
 
 
श्लोक  13.120.58-61 
मांसं तु कौमुदं पक्षं वर्जितं पार्थ राजभि:।
सर्वभूतात्मभूतस्थैर्विदितार्थपरावरै: ॥ ५८॥
नाभागेनाम्बरीषेण गयेन च महात्मना।
आयुनाथानरण्येन दिलीपरघुपूरुभि:॥ ५९॥
कार्तवीर्यानिरुद्धाभ्यां नहुषेण यतातिना।
नृगेण विष्वगश्वेन तथैव शशबिन्दुना॥ ६०॥
युवनाश्वेन च तथा शिबिनौशीनरेण च।
मुचुकुन्देन मान्धात्रा हरिश्चन्द्रेण वा विभो॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीनन्दन! जिन राजाओं ने आश्विन माह के एक या दोनों पक्षों में मांस खाना वर्जित कर दिया था, वे सभी भूतों के अवतार बन गये थे और उन्हें पारावार तत्व का ज्ञान प्राप्त हो गया था। उनके नाम इस प्रकार हैं- नाभग, अम्बरीष, महात्मा गय, आयु, अनरण्य, दिलीप, रघु, पुरु, कार्तवीर्य, ​​अनिरुद्ध, नहुष, ययाति, नृग, विश्वगश्व, शशविन्दु, युवनाश्व, उशीनरपुत्र शिबि, मुचुकुंद, मांधाता या हरिश्चंद्र। 58-61॥
 
Kuntinandan! The kings who had prohibited eating meat in one or both the fortnights of the month of Ashwin had become the embodiment of all the ghosts and had acquired the knowledge of Paravar Tattva. Their names are as follows - Nabhag, Ambarish, Mahatma Gaya, Ayu, Anaranya, Dilip, Raghu, Puru, Kartavirya, Aniruddha, Nahusha, Yayati, Nrig, Vishwagashwa, Shashvindu, Yuvnashwa, Ushinarputra Shibi, Muchukund, Mandhata or Harishchandra. 58-61॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)