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mahabharat 13.120.28: इतना ही नहीं, वह समस्त प्राणियों का आश्रयदाता है और उन सबका विश्वासपात्र है। इस संसार में न तो वह दूसरों को कष्ट देता है और न स्वयं कभी किसी से कष्ट पाता है॥ 28॥   |   mahabharat अध्याय 13.120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  13.120.28 
शरण्य: सर्वभूतानां विश्वास्य: सर्वजन्तुषु।
अनुद्वेगकरो लोके न चाप्युद्विजते सदा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इतना ही नहीं, वह समस्त प्राणियों का आश्रयदाता है और उन सबका विश्वासपात्र है। इस संसार में न तो वह दूसरों को कष्ट देता है और न स्वयं कभी किसी से कष्ट पाता है॥ 28॥
 
Not only this, he is the shelterer of all creatures and is trusted by all of them. In this world, neither does he trouble others nor does he himself ever get troubled by anyone.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)