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mahabharat 13.12.d22-d23: वह विरक्त मन से मेरु पर्वत के शिखर पर जाकर प्रायश्चित करने के लिए शरीर त्यागने को तत्पर हो गया। उसी समय धर्म ने आकर उस धर्मात्मा वत्सनाभ का हाथ पकड़ लिया।   |   mahabharat अध्याय 13.12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान  »  श्लोक d22-d23
 
 
श्लोक  13.12.d22-d23 
स मेरुशिखरं गत्वा निस्सङ्गेनान्तरात्मना।
प्रायश्चित्तं कर्तुकाम: शरीरं त्यक्तुमुद्यत:॥
निगृहीतश्च धर्मात्मा हस्ते धर्मेण धर्मवित्॥
 
 
अनुवाद
वह विरक्त मन से मेरु पर्वत के शिखर पर जाकर प्रायश्चित करने के लिए शरीर त्यागने को तत्पर हो गया। उसी समय धर्म ने आकर उस धर्मात्मा वत्सनाभ का हाथ पकड़ लिया।
 
With a detached mind, he became ready to give up his body by going to the peak of Mount Meru and seeking atonement. At this very moment Dharma came and held the hand of that religious and religious person Vatsnabha.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)