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mahabharat 13.12.53: हे देवश्रेष्ठ! हे सुरेश्वर! मैं आपसे सत्य कहता हूँ, मैंने स्त्री रूप में अधिक कामसुख भोगा है, अतः मैं स्त्री रूप से ही संतुष्ट हूँ। कृपया पधारिए॥ 53॥   |   mahabharat अध्याय 13.12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  13.12.53 
रमिताभ्यधिकं स्त्रीत्वे सत्यं वै देवसत्तम।
स्त्रीभावेन हि तुष्यामि गम्यतां त्रिदशाधिप॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
हे देवश्रेष्ठ! हे सुरेश्वर! मैं आपसे सत्य कहता हूँ, मैंने स्त्री रूप में अधिक कामसुख भोगा है, अतः मैं स्त्री रूप से ही संतुष्ट हूँ। कृपया पधारिए॥ 53॥
 
O best of gods! O lord of Sureshwars! I am telling you the truth, I have experienced more sexual pleasure in the form of a woman, hence I am satisfied with the form of a woman only. Please come.'॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)