Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.12.4: उस महापराक्रमी राजा ने अग्निष्टुत नामक यज्ञ का आयोजन किया था। इन्द्र उस यज्ञ से घृणा करते हैं, क्योंकि उसमें इन्द्र की प्रधानता नहीं है। वह यज्ञ मनुष्य के प्रायश्चित के अवसर पर अथवा पुत्र प्राप्ति की इच्छा होने पर मनोकामना स्वरूप किया जाता है। 4॥ | mahabharat अध्याय 13.12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अग्निष्टुतं स राजर्षिरिन्द्रद्विष्टं महाबल:।
प्रायश्चित्तेषु मर्त्यानां पुत्रकामेषु चेष्यते॥ ४॥
अनुवाद
उस महापराक्रमी राजा ने अग्निष्टुत नामक यज्ञ का आयोजन किया था। इन्द्र उस यज्ञ से घृणा करते हैं, क्योंकि उसमें इन्द्र की प्रधानता नहीं है। वह यज्ञ मनुष्य के प्रायश्चित के अवसर पर अथवा पुत्र प्राप्ति की इच्छा होने पर मनोकामना स्वरूप किया जाता है। 4॥
That great powerful king had organized a yagya named Agnishtuta. Indra hates that Yagya because Indra does not have predominance in it. That Yagya is performed as a wish on the occasion of human atonement or when there is a desire to have a son. 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥