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mahabharat 13.12.21-22: जैसे ही मैंने उस सरोवर में प्रवेश किया और स्नान किया, भगवान ने मुझे स्त्री रूप दे दिया। अपनी पत्नियों और मंत्रियों के नाम और गोत्र बताकर स्त्रीरूपी उस महान राजा ने अपने पुत्रों से कहा - 'पुत्रो! तुम सब आपस में प्रेमपूर्वक रहो और राज्य का सुख भोगो। अब मैं वन में जाऊँगा।'   |   mahabharat अध्याय 13.12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  13.12.21-22 
तत्रावगाढ: स्त्रीभूतो दैवेनाहं कृत: पुरा।
नामगोत्राणि चाभाष्य दाराणां मन्त्रिणां तथा॥ २१॥
आह पुत्रांस्तत: सोऽथ स्त्रीभूत: पार्थिवोत्तम:।
सम्प्रीत्या भुज्यतां राज्यं वनं यास्यामि पुत्रका:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जैसे ही मैंने उस सरोवर में प्रवेश किया और स्नान किया, भगवान ने मुझे स्त्री रूप दे दिया। अपनी पत्नियों और मंत्रियों के नाम और गोत्र बताकर स्त्रीरूपी उस महान राजा ने अपने पुत्रों से कहा - 'पुत्रो! तुम सब आपस में प्रेमपूर्वक रहो और राज्य का सुख भोगो। अब मैं वन में जाऊँगा।'
 
As soon as I entered that lake and took a bath, the God transformed me into a woman. After telling the names and clans of his wives and ministers, that great king in the form of a woman said to his sons - 'Sons! You all live with love amongst yourselves and enjoy the kingdom. Now I will go to the forest.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)