Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.119.7-8: जीव मन, वाणी और कर्म से हिंसा के पाप में लिप्त रहता है, परंतु जो पहले मन से, फिर वाणी से और फिर कर्म से हिंसा का धीरे-धीरे त्याग कर देता है और कभी मांस नहीं खाता, वह ऊपर बताई गई तीनों प्रकार की हिंसा के पाप से मुक्त हो जाता है ॥7-8॥ | mahabharat अध्याय 13.119: हिंसा और मांसभक्षणकी घोर निन्दा । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
कर्मणा लिप्यते जन्तुर्वाचा च मनसापि च॥ ७॥
पूर्वं तु मनसा त्यक्त्वा तथा वाचाथ कर्मणा।
न भक्षयति यो मांसं त्रिविधं स विमुच्यते॥ ८॥
अनुवाद
जीव मन, वाणी और कर्म से हिंसा के पाप में लिप्त रहता है, परंतु जो पहले मन से, फिर वाणी से और फिर कर्म से हिंसा का धीरे-धीरे त्याग कर देता है और कभी मांस नहीं खाता, वह ऊपर बताई गई तीनों प्रकार की हिंसा के पाप से मुक्त हो जाता है ॥7-8॥
A living being is involved in the sin of violence through the mind, speech and action, but one who gradually renounces violence first through the mind, then through speech and then through action and never eats meat, becomes free from the sin of all the three types of violence mentioned above. ॥ 7-8॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥