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mahabharat 13.119.2-3: युधिष्ठिर ने पूछा - महामते! देवता, ऋषि और ब्राह्मण सदैव वैदिक प्रमाणों के अनुसार अहिंसा की प्रशंसा करते हैं। अतः नृपश्रेष्ठ! मैं पूछता हूँ कि जो मनुष्य मन, वाणी और कर्म से हिंसा में लिप्त रहता है, वह अपने दुःख से कैसे छुटकारा पा सकता है? 2-3॥   |   mahabharat अध्याय 13.119: हिंसा और मांसभक्षणकी घोर निन्दा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 119: हिंसा और मांसभक्षणकी घोर निन्दा  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  13.119.2-3 
युधिष्ठिर उवाच
ऋषयो ब्राह्मणा देवा: प्रशंसन्ति महामते।
अहिंसालक्षणं धर्मं वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ २॥
कर्मणा मनुज: कुर्वन् हिंसां पार्थिवसत्तम।
वाचा च मनसा चैव कथं दु:खात् प्रमुच्यते॥ ३॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - महामते! देवता, ऋषि और ब्राह्मण सदैव वैदिक प्रमाणों के अनुसार अहिंसा की प्रशंसा करते हैं। अतः नृपश्रेष्ठ! मैं पूछता हूँ कि जो मनुष्य मन, वाणी और कर्म से हिंसा में लिप्त रहता है, वह अपने दुःख से कैसे छुटकारा पा सकता है? 2-3॥
 
Yudhishthir asked – Mahamate! Gods, sages and Brahmins always praise non-violence as per Vedic evidence. Hence Nripashrestha! I ask, how can a person who indulges in violence in his mind, speech and actions get rid of his sorrow? 2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)