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mahabharat 13.117.9: युधिष्ठिर, अब मैं उन उत्तम दानों का वर्णन करूँगा, जिनके देने से यदि मनुष्य कोई ऐसा कार्य भी कर ले जिसे वह स्वयं नहीं कर सकता, तो भी उसे धर्म का फल प्राप्त होता है।   |   mahabharat अध्याय 13.117: पापसे छूटनेके उपाय तथा अन्नदानकी विशेष महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 117: पापसे छूटनेके उपाय तथा अन्नदानकी विशेष महिमा  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  13.117.9 
प्रदानानि तु वक्ष्यामि यानि दत्त्वा युधिष्ठिर।
नर: कृत्वाप्यकार्याणि ततो धर्मेण युज्यते॥ ९॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर, अब मैं उन उत्तम दानों का वर्णन करूँगा, जिनके देने से यदि मनुष्य कोई ऐसा कार्य भी कर ले जिसे वह स्वयं नहीं कर सकता, तो भी उसे धर्म का फल प्राप्त होता है।
 
Yudhishthira, I shall now describe those excellent gifts, by giving which, even if a man commits an act which he cannot do, he still attains the fruits of Dharma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)