vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
»
श्लोक 82
श्लोक
13.116.82
कृमिर्जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत।
अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानव:॥ ८२॥
अनुवाद
हे भारत! वह कीड़ा पंद्रह वर्ष तक जीवित रहता है, फिर अपने पापों का नाश करके मनुष्य योनि में जन्म लेता है। 82.
O Bharata! That insect lives for fifteen years. Then after destroying its sins, it takes birth as a human being. 82.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×