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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
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श्लोक 57
श्लोक
13.116.57
यदि पुत्रसमं शिष्यं गुरुर्हन्यादकारणे।
आत्मन: कामकारेण सोऽपि हिंस्र: प्रजायते॥ ५७॥
अनुवाद
यदि कोई गुरु अपने शिष्य को बिना किसी कारण के अपने पुत्र के समान पीटता है तो उसकी मनमानी के कारण वह हिंसक पशु की योनि में जन्म लेता है।
If a Guru beats his disciple like his own son without any reason then due to his arbitrariness he takes birth in the womb of a violent animal.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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