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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
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श्लोक 45
श्लोक
13.116.45
येन येन तु भावेन कर्मणा पुरुषो गतिम्।
प्रयाति परुषां घोरां तत्ते वक्ष्याम्यत: परम्॥ ४५॥
अनुवाद
अब मैं उन नाना भावों और कर्मों का वर्णन कर रहा हूँ जिनके द्वारा मनुष्य निर्दयी और भयंकर गति को प्राप्त होता है ॥ 45॥
I am now describing the various feelings and actions by which a man attains a ruthless and terrible fate. ॥ 45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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