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mahabharat 13.115.9: हे पुरुषों! भरणी को चन्द्रमा का मस्तक और आर्द्रा को केश समझो। (इस प्रकार शरीर के विभिन्न अंगों में तारों की स्थापना करके, उन अंगों का पूजन और मंत्र जप करो) प्रतिदिन होम आदि करो। पूर्णिमा के दिन व्रत समाप्त होने पर वेदों के ज्ञाता विद्वान ब्राह्मण को घी दान करो।   |   mahabharat अध्याय 13.115: रूप-सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र-व्रत करनेका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.115.9 
भरण्यां तु शिरो विद्यात् केशानार्द्रां नराधिप।
समाप्ते तु घृतं दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषों! भरणी को चन्द्रमा का मस्तक और आर्द्रा को केश समझो। (इस प्रकार शरीर के विभिन्न अंगों में तारों की स्थापना करके, उन अंगों का पूजन और मंत्र जप करो) प्रतिदिन होम आदि करो। पूर्णिमा के दिन व्रत समाप्त होने पर वेदों के ज्ञाता विद्वान ब्राह्मण को घी दान करो।
 
Lord of men! Consider Bharani as the head and Ardra as the hair of the moon. (In this way, after establishing stars in different body parts, worship and chant the respective mantras of those body parts) perform homa etc. every day. After the fast is over on the full moon day, donate ghee to a learned Brahmin who is well versed in the Vedas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)