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mahabharat 13.115.4: जंघाओं में अश्विनी नक्षत्र की स्थिति, जंघाओं में पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्रों की स्थिति, गुप्तांगों में पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्रों की स्थिति और कमर के भाग में कृत्तिका की स्थिति को समझें। ॥ 4॥   |   mahabharat अध्याय 13.115: रूप-सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र-व्रत करनेका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.115.4 
अश्विन्यां सक्थिनी चैव ऊरू चाषाढयोस्तथा।
गुह्यं तु फाल्गुनी विद्यात् कृत्तिका कटिकास्तथा॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जंघाओं में अश्विनी नक्षत्र की स्थिति, जंघाओं में पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्रों की स्थिति, गुप्तांगों में पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्रों की स्थिति और कमर के भाग में कृत्तिका की स्थिति को समझें। ॥ 4॥
 
Understand the position of Ashwini nakshatra in the thighs, Purvashada and Uttarashadha nakshatras in the thighs, Purvaphalguni and Uttara-phalguni nakshatras in the private parts and Krittika position in the waist part. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)