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mahabharat 13.113.d1h-6: परन्तु जिस बुद्धिमान पुरुष के मन में अहंकार नहीं है, वही श्रेष्ठ तीर्थ है। भगवान नारायण या भगवान शिव की भक्ति भी श्रेष्ठ तीर्थ मानी गई है। यदि आप इस पर विचार करेंगे तो पवित्रता का यह चिन्ह सर्वत्र दिखाई देगा। 6॥   |   mahabharat अध्याय 13.113: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.113.d1h-6 
तत्त्ववित्त्वनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते।
(नारायणेऽथ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थं परं मता।)
शौचलक्षणमेतत् ते सर्वत्रैवान्ववेक्षत:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
परन्तु जिस बुद्धिमान पुरुष के मन में अहंकार नहीं है, वही श्रेष्ठ तीर्थ है। भगवान नारायण या भगवान शिव की भक्ति भी श्रेष्ठ तीर्थ मानी गई है। यदि आप इस पर विचार करेंगे तो पवित्रता का यह चिन्ह सर्वत्र दिखाई देगा। 6॥
 
But the wise man in whose mind there is no ego is called the best pilgrim. The devotion towards Lord Narayana or Lord Shiva is also considered as the best pilgrimage. This sign of purity will be visible everywhere if you think about it. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)