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mahabharat 13.113.20-21: जिस प्रकार इस संसार में कर्म के बिना बल या कर्म के बिना बल कोई कार्य नहीं कर सकता। बल और कर्म दोनों के सम्मिलित होने पर ही कार्य सिद्ध होता है, उसी प्रकार शरीर की शुद्धि और तीर्थ की शुद्धि वाला व्यक्ति ही शुद्ध होकर ईश्वर प्राप्ति की सिद्धि प्राप्त करता है। इसलिए दोनों प्रकार की शुद्धि को श्रेष्ठ माना गया है।   |   mahabharat अध्याय 13.113: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 113: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  13.113.20-21 
यथा बलं क्रियाहीनं क्रिया वा बलवर्जिता।
नेह साधयते कार्यं समायुक्ता तु सिध्यति॥ २०॥
एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वित:।
शुचि: सिद्धिमवाप्नोति द्विविधं शौचमुत्तमम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार इस संसार में कर्म के बिना बल या कर्म के बिना बल कोई कार्य नहीं कर सकता। बल और कर्म दोनों के सम्मिलित होने पर ही कार्य सिद्ध होता है, उसी प्रकार शरीर की शुद्धि और तीर्थ की शुद्धि वाला व्यक्ति ही शुद्ध होकर ईश्वर प्राप्ति की सिद्धि प्राप्त करता है। इसलिए दोनों प्रकार की शुद्धि को श्रेष्ठ माना गया है।
 
Just as force without action or action without force cannot do any work in this world. The work is accomplished only when both force and action are combined, similarly, only a person with purity of body and purity of pilgrimage becomes pure and attains the accomplishment of attaining God. Therefore, both types of purification are considered best.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शौचानुपृच्छा नामाष्टाधिकशततमोऽध्याय:॥ १०८॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुद्धिकी जिज्ञासा नामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०८॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल २१ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)