Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.112.93-96h: जो बारह महीनों तक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है और इक्कीसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह शुक्राचार्य और इंद्र के दिव्य लोक में जाता है। इतना ही नहीं, वह अश्विनीकुमारों और मरुतगणों के लोकों को भी प्राप्त करता है। उन लोकों में वह सुखों का भोग करने में सदैव तत्पर रहता है। वह दुःखों का नाम भी नहीं जानता और सुंदर स्त्रियों से सेवित उत्तम विमान पर बैठकर वह शक्तिशाली देवताओं की भाँति क्रीड़ा करता है। 93-95 1/2। | mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
एकविंशे तु दिवसे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम्॥ ९३॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम्।
लोकमौशनसं दिव्यं शक्रलोकं च गच्छति॥ ९४॥
अश्विनोर्मरुतां चैव सुखेष्वभिरत: सदा।
अनभिज्ञश्च दु:खानां विमानवरमास्थित:॥ ९५॥
सेव्यमानो वरस्त्रीभि: क्रीडत्यमरवत् प्रभु:।
अनुवाद
जो बारह महीनों तक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है और इक्कीसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह शुक्राचार्य और इंद्र के दिव्य लोक में जाता है। इतना ही नहीं, वह अश्विनीकुमारों और मरुतगणों के लोकों को भी प्राप्त करता है। उन लोकों में वह सुखों का भोग करने में सदैव तत्पर रहता है। वह दुःखों का नाम भी नहीं जानता और सुंदर स्त्रियों से सेवित उत्तम विमान पर बैठकर वह शक्तिशाली देवताओं की भाँति क्रीड़ा करता है। 93-95 1/2।
He who performs Agnihotra every day for twelve months and eats once on the twenty-first day, goes to the divine world of Shukracharya and Indra. Not only this, he also attains the worlds of Ashwinikumars and Marutgans. In those worlds, he is always ready to enjoy pleasures. He does not even know the name of sorrows and sitting on the best plane, served by beautiful women, he plays like a powerful god. 93-95 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥