श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  13.112.9-10h 
त्रीणि वर्षाणि य: प्राशेत् सततं त्वेकभोजनम्॥ ९॥
धर्मपत्नीरतो नित्यमग्निष्टोमफलं लभेत्।
 
 
अनुवाद
जो पुरुष अपनी पत्नी परायण होकर तीन वर्ष तक प्रतिदिन केवल एक बार भोजन करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है॥9 1/2॥
 
He who, being devoted to his own wife, eats only once a day for three years continuously, gets the fruits of Agnishtoma Yagna.॥ 9 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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