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mahabharat 13.112.77-78h: वह मनुष्य दस महाकल्प और चार चतुर्युगीता तक अपने पुण्य का फल भोगता है, जो सौ पद्म वर्ष के बराबर है ॥77 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.112.77-78h 
फलं पद्मशतप्रख्यं महाकल्पं दशाधिकम्॥ ७७॥
आवर्तनानि चत्वारि साधयेच्चाप्यसौ नर:।
 
 
अनुवाद
वह मनुष्य दस महाकल्प और चार चतुर्युगीता तक अपने पुण्य का फल भोगता है, जो सौ पद्म वर्ष के बराबर है ॥77 1/2॥
 
That man enjoys the fruits of his virtue for ten Mahakalpas and four Chaturyu Geeta, equivalent to a hundred Padma years. 77 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)