श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 73-74h
 
 
श्लोक  13.112.73-74h 
दिव्यं दिव्यगुणोपेतं विमानमधिरोहति।
मणिमुक्ताप्रवालैश्च भूषितं वैद्युतप्रभम्॥ ७३॥
वसेद् युगसहस्रं च खड्गकुञ्जरवाहन:।
 
 
अनुवाद
वह दिव्य विमान रत्नों, मोतियों और मूंगों से विभूषित है, जो विद्युत की चमक से प्रकाशित है और दिव्य गुणों से युक्त है। व्रत करने वाला मनुष्य उस विमान पर सवार होता है। वह विमान गैंडों और हाथियों से युक्त है और वह एक हजार युगों तक वहाँ निवास करता है।
 
That divine plane decorated with gems, pearls and corals is illuminated with the radiance of electricity and is full of divine qualities. The man who observes a vow rides on that plane. It is harnessed with rhinoceroses and elephants and he resides there for a thousand yugas. 73 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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