श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  13.112.67 
कलहंसविनिर्घोषैर्नूपुराणां च नि:स्वनै:।
काञ्चीनां च समुत्कर्षैस्तत्र तत्र निबोध्यते॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
जब वह सो जाता है तो हंसों की चहचहाहट, पायल की मधुर झंकार और कांच की मधुर ध्वनि से उसकी नींद खुल जाती है। 67.
 
When he falls asleep he is awakened by the chirping of geese, the sweet tinkling of anklets and the beautiful sounds of glass. 67.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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