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mahabharat 13.112.43-45: जो मनुष्य एक वर्ष तक दस दिन में एक बार भोजन करता है और बारह महीने तक प्रतिदिन अग्नि में आहुति देता है, वह समस्त प्राणियों को सुन्दर लगने वाली ब्राह्मणी के धाम में जाता है और एक हजार अश्वमेध यज्ञों का उत्तम फल प्राप्त करता है। वह सनातन पुरुष वहाँ सुन्दरी कन्याओं द्वारा भोग लगाता है।   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.112.43-45 
यस्तु संवत्सरं भुङ्‍‍क्ते दशाहे वै गते गते॥ ४३॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम्।
ब्रह्मकन्यानिवासे च सर्वभूतमनोहरे॥ ४४॥
अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम्।
रूपवत्यश्च तं कन्या रमयन्ति सनातनम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य एक वर्ष तक दस दिन में एक बार भोजन करता है और बारह महीने तक प्रतिदिन अग्नि में आहुति देता है, वह समस्त प्राणियों को सुन्दर लगने वाली ब्राह्मणी के धाम में जाता है और एक हजार अश्वमेध यज्ञों का उत्तम फल प्राप्त करता है। वह सनातन पुरुष वहाँ सुन्दरी कन्याओं द्वारा भोग लगाता है।
 
He who eats a meal once every ten days for a year and offers oblations into the fire every day for twelve months, goes to the abode of the Brahman maidens who are beautiful to all beings, and obtains the most excellent fruit of a thousand Ashwamedha Yajnas, and the eternal man is entertained by the beautiful maidens there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)