श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 41-43h
 
 
श्लोक  13.112.41-43h 
पुण्डरीकप्रकाशं च विमानं लभते नर:।
दीप्तसूर्याग्नितेजोभिर्दिव्यमालाभिरेव च॥ ४१॥
नीयते रुद्रकन्याभि: सोऽन्तरिक्षं सनातनम्।
अष्टादश सहस्राणि वर्षाणां कल्पमेव च॥ ४२॥
कोटीशतसहस्रं च तेषु लोकेषु मोदते।
 
 
अनुवाद
और उसे पुण्डरीक के समान श्वेत वर्ण वाला विमान मिलता है। चमकते हुए सूर्य और अग्नि के समान रुद्रकन्याएं तथा दिव्य माला धारण करने वाली रुद्रकन्याएं उसे अनन्त अन्तरिक्ष लोक में ले जाती हैं और वहां वह एक कल्प, लाखों करोड़ और अठारह हजार वर्षों तक सुख भोगता है।
 
And he finds a plane of white colors like Pundarika. The shining Sun and the fire-like Rudrakanyas and the divine garland-wearing Rudrakanyas take him to the eternal space world and there he enjoys happiness for one Kalpa, lakhs of crores and eighteen thousand years.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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