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mahabharat 13.112.36-37: जो मनुष्य एक वर्ष तक प्रत्येक आठवें दिन एक बार भोजन करता है, सबके प्रति क्षमाशील है, देवताओं की सेवा में सदैव तत्पर रहता है और नियमित रूप से अग्निहोत्र करता है, उसे पौण्डरिक यज्ञ का उत्तम फल प्राप्त होता है।।36-37।।   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.112.36-37 
यस्तु संवत्सरं क्षान्तो भुङ्‍‍क्तेऽहन्यष्टमे नर:॥ ३६॥
देवकार्यपरो निन्यं जुह्वानो जातवेदसम्।
पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य एक वर्ष तक प्रत्येक आठवें दिन एक बार भोजन करता है, सबके प्रति क्षमाशील है, देवताओं की सेवा में सदैव तत्पर रहता है और नियमित रूप से अग्निहोत्र करता है, उसे पौण्डरिक यज्ञ का उत्तम फल प्राप्त होता है।।36-37।।
 
He who takes food once every eighth day for a year, is forgiving towards all, is always ready to serve the gods and regularly performs Agnihotra, gets the best results of the Paundarik Yagya. 36-37.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)