श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 32-34
 
 
श्लोक  13.112.32-34 
दिवसे सप्तमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम्॥ ३२॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम्।
सरस्वतीं गोपयानो ब्रह्मचर्यं समाचरन्॥ ३३॥
सुमनोवर्णकं चैव मधुमांसं च वर्जयन्।
पुरुषो मरुतां लोकमिन्द्रलोकं च गच्छति॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जो बारह महीनों तक प्रति सातवें दिन एक बार भोजन करता है, प्रतिदिन अग्नि में हवन करता है, वाणी पर संयम रखता है, ब्रह्मचर्य का पालन करता है तथा पुष्पमाला, चंदन, मधु और मांस का सदा के लिए त्याग कर देता है, वह मनुष्य मरुभूमि और इन्द्र के लोक में जाता है ॥32-34॥
 
One who eats one meal every seventh day for twelve months, makes offerings to the fire every day, controls his speech, observes celibacy and gives up garlands of flowers, sandalwood, honey and meat forever, that man goes to the desert and the world of Indra. 32-34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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