श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 30-32h
 
 
श्लोक  13.112.30-32h 
कोटीसहस्रं वर्षाणां त्रीणि कोटिशतानि च॥ ३०॥
पद्मान्यष्टादश तथा पताके द्वे तथैव च।
अयुतानि च पञ्चाशदृक्षचर्मशतस्य च॥ ३१॥
लोम्नां प्रमाणेन समं ब्रह्मलोके महीयते।
 
 
अनुवाद
वह पुरुष ब्रह्मलोक में दो ध्वजों (महापद्म), अठारह पद्मों, एक हजार तीन सौ करोड़ पचास अयुत वर्षों तक तथा सौ भालुओं की खालों में जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक सम्मानित होता है ॥30-31 1/2॥
 
That person is honoured in Brahmaloka for two flags (Mahapadma), eighteen padmas, one thousand three hundred crore and fifty Ayuta years and for the number of years which is the number of hairs in the skins of a hundred bears. ॥30-31 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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