श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  13.112.3 
पार्थिवै राजपुत्रैर्वा शक्या: प्राप्तुं पितामह।
नार्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतै: ॥ ३॥
 
 
अनुवाद
दादाजी! उन यज्ञों का लाभ केवल राजा या राजकुमार ही उठा सकते हैं। जो धनहीन, गुणहीन, एकाकी और असहाय हैं, वे ऐसे यज्ञ नहीं कर सकते।
 
Grandfather! Only a king or a prince can take advantage of those yagnas. Those who lack wealth, lack qualities, are lonely and helpless cannot perform such yagnas.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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