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mahabharat 13.112.22-24h: जो बारह महीनों तक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, पाँचवें दिन एक बार भोजन करता है, लोभ से रहित, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त, अहिंसक, दोषरहित और पापकर्मों से सदैव दूर रहता है, वह द्वादश यज्ञ का फल प्राप्त करता है॥ 22-23 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 22-24h
 
 
श्लोक  13.112.22-24h 
दिवसे पञ्चमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम्॥ २२॥
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम्।
अलुब्ध: सत्यवादी च ब्रह्मण्यश्चाविहिंसक:॥ २३॥
अनसूयुरपापस्थो द्वादशाहफलं लभेत्।
 
 
अनुवाद
जो बारह महीनों तक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, पाँचवें दिन एक बार भोजन करता है, लोभ से रहित, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त, अहिंसक, दोषरहित और पापकर्मों से सदैव दूर रहता है, वह द्वादश यज्ञ का फल प्राप्त करता है॥ 22-23 1/2॥
 
He who performs Agnihotra every day for twelve months, eats once a day every fifth day, is free from greed, truthful, a devotee of Brahmins, non-violent, faultless and always stays away from sinful acts, gets the fruits of Dvadashāh Yajna.॥ 22-23 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)