श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  13.112.2 
न ते शक्या दरिद्रेण यज्ञा: प्राप्तुं पितामह।
बहूपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तरा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
परंतु हे पितामह! उन यज्ञों का लाभ दरिद्र मनुष्य नहीं उठा सकता, क्योंकि उन यज्ञों के लिए अनेक साधन होते हैं और नाना प्रकार की व्यवस्थाओं के कारण उनका परिमाण अनेक गुना बढ़ जाता है॥ 2॥
 
But, O grandfather! A poor man cannot take advantage of those yagnas because there are many instruments for those yagnas and their scale increases manifold due to various types of arrangements.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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