श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  13.112.19-20 
दिवसे यश्चतुर्थे तु प्राश्नीयादेकभोजनम्॥ १९॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम्।
वाजपेयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है और बारह महीनों तक प्रति चौथे दिन एक बार भोजन करता है, उसे वाजपेय यज्ञ का उत्तम फल प्राप्त होता है॥19-20॥
 
He who performs Agnihotra every day and eats food once every fourth day for twelve months, obtains the most excellent result of the Vajapeya yajna.॥ 19-20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)