श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  13.112.16-17 
तृतीये दिवसे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम्।
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम्॥ १६॥
अग्निकार्यपरो नित्यं नित्यं कल्यप्रबोधन:।
अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो बारह महीनों तक हर तीसरे दिन एक बार भोजन करता है, प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर अग्नि की देखभाल करने में तत्पर रहता है और प्रतिदिन अग्नि में आहुति देता है, उसे रात्रियज्ञ का उत्तम फल प्राप्त होता है ॥16-17॥
 
The one who eats one meal every third day for twelve months, wakes up early in the morning every day and is ready to take care of the fire and offers sacrifices to the fire daily, he gets the best results of the night sacrifice. 16-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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