श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 135-136h
 
 
श्लोक  13.112.135-136h 
विप्रुषश्चैव यावन्त्यो निपतन्ति नभस्तलात्॥ १३५॥
वर्षासु वर्षतस्तावन्निवसत्यमरप्रभ:।
 
 
अनुवाद
दिव्य तेज वाला पुरुष उतने वर्षों तक ब्रह्मलोक में रहता है, जितने वर्षा ऋतु में आकाश से पृथ्वी पर जल की बूँदें गिरती हैं ॥135 1/2॥
 
The person with divine brilliance stays in Brahmaloka for as many years as the number of drops of water that fall from the sky to the earth during the rainy season. ॥135 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas