श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 132-134h
 
 
श्लोक  13.112.132-134h 
विमाने गगनाकारे सूर्यवैदूर्यसंनिभे॥ १३२॥
पृष्ठत: सोमसंकाशे उदर्के चाभ्रसन्निभे।
दक्षिणायां तु रक्ताभे अधस्तान्नीलमण्डले॥ १३३॥
ऊर्ध्वं विचित्रसंकाशे नैको वसति पूजित:।
 
 
अनुवाद
जिस विमान पर वे विराजमान हैं, वह आकाश के समान विशाल प्रतीत होता है। वह सूर्य और वैदूर्य मणि के समान प्रकाशमान है। उसका पिछला भाग चन्द्रमा के समान, बायाँ भाग मेघ के समान, दायाँ भाग लाल रंग का, निचला भाग नीले गोले के समान तथा ऊपरी भाग अनेक रंगों के मिश्रण के कारण विचित्र प्रतीत होता है। वे उसमें अनेक स्त्री-पुरुषों के साथ प्रतिष्ठित होकर निवास करते हैं। (132-133 1/2)
 
The plane on which he sits appears as vast as the sky. It appears as radiant as the Sun and the Vaidurya Mani. Its rear portion is like the Moon, its left portion is like a cloud, its right portion has a red glow, its lower portion is like a blue sphere and the upper portion appears strange due to the mixture of many colors. He resides in it with many men and women, being respected. 132-133 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)