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mahabharat 13.112.128-129h: वहाँ वे सुदर्शन का अन्न खाते हैं और सबके मन को मोह लेने वाला तेजस्वी रूप धारण करते हैं। वे अपने उज्ज्वल, सुन्दर शरीर और कांतियुक्त अंगों से सूर्य के समान प्रकाशित होते हैं। 128 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 128-129h
 
 
श्लोक  13.112.128-129h 
सुधारसकृताहार: श्रीमान् सर्वमनोहर:॥ १२८॥
तेजसा वपुषा लक्ष्म्या भ्राजते रश्मिवानिव।
 
 
अनुवाद
वहाँ वे सुदर्शन का अन्न खाते हैं और सबके मन को मोह लेने वाला तेजस्वी रूप धारण करते हैं। वे अपने उज्ज्वल, सुन्दर शरीर और कांतियुक्त अंगों से सूर्य के समान प्रकाशित होते हैं। 128 1/2॥
 
There he eats the food of Sudharsa and assumes a radiant form that captivates everyone's heart. He shines like the sun with his bright, beautiful body and glowing limbs. 128 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)