श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 125-127h
 
 
श्लोक  13.112.125-127h 
भोगवांस्तेजसा युक्तो वैश्वानरसमप्रभ:॥ १२५॥
दिव्यो दिव्येन वपुषा भ्राजमान इवामर:।
वसूनां मरुतां चैव साध्यानामश्विनोस्तथा॥ १२६॥
रुद्राणां च तथा लोकं ब्रह्मलोकं च गच्छति।
 
 
अनुवाद
वह मनुष्य सुखों से युक्त, तेजस्वी, अग्नि के समान तेजस्वी, देवताओं के समान दिव्य शरीर से प्रकाशित और दिव्य भावनाओं से युक्त होकर वसुओं, मरुद्गणों, साध्यगणों, अश्विनीकुमारों, रुद्रों और ब्रह्माजी के लोकों में भी जाता है ॥125-126 1/2॥
 
That man, full of pleasures, brilliant, radiant like fire, luminous with his divine body like a god and filled with divine feelings, also goes to the worlds of Vasus, Marudganas, Sadhyaganas, Ashwinikumars, Rudras and Brahmaji. 125-126 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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