श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 109-111
 
 
श्लोक  13.112.109-111 
षड्‍‍विंशे दिवसे यस्तु प्रकुर्यादेकभोजनम्॥ १०९॥
सदा द्वादशमासांस्तु नियतो नियताशन:।
जितेन्द्रियो वीतरागो जुह्वानो जातवेदसम्॥ ११०॥
स प्राप्नोति महाभाग: पूज्यमानोऽप्सरोगणै:।
सप्तानां मरुतां लोकान् वसूनां चापि सोऽश्नुते॥ १११॥
 
 
अनुवाद
जो बारह महीनों तक निरन्तर अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखता है, संयमी भोजन करता है और छब्बीसवें दिन केवल एक बार भोजन करता है, तथा विरक्त होकर अपनी इन्द्रियों को वश में करके प्रतिदिन अग्नि में हवि करता है, वह भाग्यशाली पुरुष अप्सराओं द्वारा पूजित होकर सात मरुतगणों और आठ वसुओं के लोकों में जाता है॥109-111॥
 
He who for twelve months continuously controls his mind and senses, is a moderate eater and eats only once on the twenty-sixth day, and being detached and having controlled his senses, makes an offering to the fire every day, that fortunate person being worshipped by the Apsaras, goes to the worlds of the seven Marutganas and the eight Vasus.॥109-111॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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