श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 105-106h
 
 
श्लोक  13.112.105-106h 
पञ्चविंशे तु दिवसे य: प्राशेदेकभोजनम्॥ १०५॥
सदा द्वादशमासांस्तु पुष्कलं यानमारुहेत् ।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य लगातार बारह महीनों तक पच्चीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे सवारी के लिए बहुत से विमान या वाहन मिलते हैं ॥105 1/2॥
 
He who eats a single meal on the twenty-fifth day for twelve consecutive months, gets many planes or vehicles to ride. ॥105 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas