श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 104-105h
 
 
श्लोक  13.112.104-105h 
विमाने काञ्चने दिव्ये हंसयुक्ते मनोरमे॥ १०४॥
रमते देवकन्यानां सहस्रैरयुतैस्तथा।
 
 
अनुवाद
वहाँ वह हजारों और अजर देवियों के साथ हंसों से सुशोभित सुन्दर एवं दिव्य स्वर्णमय विमान में आनन्दित होता है ॥104 1/2॥
 
There he rejoices in the beautiful and divine golden plane adorned with swans along with thousands and ageless goddesses. 104 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)